अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा का संक्षिप्त इतिहास

माहेश्वरी जाति का यह वृहत्‌ संगठन है। इसकी शाखाएं न केवल भारत भर में फैली हैं, अपितु नेपाल, बांगलादेश , ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका में भी है। माहेश्वरी समाज के साथ-साथ अन्य समाज की उन्नति करना, यह इस संगठन का उद्देश्यय रहा है। यह संगठन समाज में समयानुकूल परिवर्तन का प्रयास करते हुए .... माहेश्वरी समाज राष्ट्र का प्रगतिशील अंग कैसा बनेगा इसकी ओर विशेष ध्यान देने की कोशीश करता आया है।

सन्‌ 1891 में अजमेर में स्व. श्री लोईवाल जी, किशनगढ़ के दीवान की अध्यक्षता में समाज संगठन की नींव रखी गई तथा माहेश्वरी महत्‌ सभा की स्थापना हुई। हम सबके लिए यह गर्व की बात है कि माहेश्वरी समाज का यह संगठन सर्वप्रथम जातीय संगठन था। इस सभी के उद्देद्गय के प्रचार के लिए ''महेश्वरी '' नामक पत्र निकाला गया। जिसकी प्रतियां देश भर में सभी माहेश्वरी सज्जनों को भेजी गई। मासिक रूप में ''महेश्वरी '' का प्रकाशन अजमेर से प्रारम्भ हुआ।

आगे सन्‌ 1892 में आगरा में ''महेश्वरी '' का प्रकाशन शुरू हुआ। लेकिन फिर यह प्रकाशन बंद हुआ और बाद में हापुड से इसका प्रकाशन शुरू हुआ।

इस माहेश्वरी महत्‌ सभा का द्वितीय अधिवेशन किशनगढ में तथा तृतीय अधिवेशन अजमेर में करने का निश्चय किया गया।

1894 में माहेश्वरी महत्‌ सभा द्वारा नियुक्त उपसभा के प्रयासों से सहारनपुर में श्रीनथमल जी मेहता (दीवान, जैसलमेर) की अध्यक्षता में प्रथम माहेश्वरी कॉन्फ्रेन्स हुई जिसमें 16 प्रस्ताव स्वीकृत हुए। उनमें निम्न प्रस्ताव प्रमुख थे :-

1. पंजाबी, मारवाड़ी, जैसलमेरी, ढुढाढि, जयपुरी, बीकानेरी आदि सभी माहेश्वरी बंधुओं से आपस में प्रेम और विवाह सम्बन्ध करने का अनुरोध किया गया।

2. विवाह तथा मृत्यु आदि अवसरों पर मर्यादा से ज्यादा खर्च करने पर निषेध किया गया।

3. कन्या के बदले में धन लेना निषेध माना गया।

4. गरीब माहेश्वरी भाईयों की सहायता करने का विचार किया गया।

5. अनाथ माहेश्वरियों की रक्षा के लिए अनाथालय, शिक्षा के लिए पाठशालाएं स्थापित करना तथा विधवा एवं अपाहिजों की सहायता करने की अपील की।

6. बाल विवाह को निषेध किया गया तथा विवाह के समय लडकी की आयु 14 तथा लडके की आयु 18 वर्ष से कम न हो ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया। देश में माहेश्वरी समाज ही सबसे पहला समाज है जिसने बाल-विवाह को निषेध किया और ऐसा ही केन्द्रीय असेम्बली में दीवान बहादुर हरिविलास जी शारदा (अजमेर) द्वारा रखा गया जो ''शारदा एक्ट'' नाम से विखयात है। यह एक्ट 1930 में पास हुआ। अर्थात्‌ कानून बनने के पहले ''माहेश्वरी महत्‌ सभा'' समाज में इसका प्रचार कर चुकी थी।

1895 में द्वितीय माहेश्वरी कॉन्फ्रेन्स मथुरा में आयोजित की गई। इसमें कन्या विक्रय की निंदा, बाल-विवाह का निषेध, वृद्ध विवाह की निंदा, ओसर-मोसर करने का निषेध एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों का निषेध किया गया।
1896 में तृतीय माहेश्वरी कॉन्फ्रेन्स अजमेर में वैश्य महासभा के साथ आयोजित की गई इसका निमंत्रण देशभर में माहेश्वरी सज्जनों के पास भेजा गया था।
1898में दिल्ली में चतुर्थ अधिवेशन वैश्य महासभा के साथ सम्पन्न हुआ। 1900 में अलीगढ़ में पंचम अधिवेशन सम्पन्न हुआ।

इसके बाद इस महत्‌ सभा का कार्य बंद हो गया। दस वर्ष की अवधि में इस सभा ने माहेश्वरी समाज में सामाजिक जागृति का ठोस एवं महत्वपूर्ण कार्य किया।

1908 में माहेश्वरी महासभा का प्रादुर्भाव हुआ और पहला अधिवेशन अमरावती में सम्पन्न हुआ। जिसमें राजा गोकुलदास जी मालपाणी अध्यक्ष तथा श्री श्रीकृष्णदास जी जाजू प्रधानमंत्री चुने गए। इस अधिवेशन में 7- 8हजार समाज बंधु पधारे थे।

इस अधिवेशन में मुखयतः निम्न प्रस्ताव पारित हुए :-
अकारण सगाई न तोडी जाए, पच्चीस वर्ष से कम आयु वाले व्यक्ति की मृत्यु होने पर मोसर न किया जाए, विवाह में वधु की आयु वर से 4 वर्ष कम होनी चाहिए, कन्या विक्रय पर बंधन, 45 वर्ष की आयु के बाद विवाह न किया जाय, विवाह से पूर्व जनेऊ धारण कर लेना चाहिए।

1912 में दूसरा अधिवेद्गान नागपुर में श्री सेठ फतेहचन्द्र जी सावणा (राठी) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री श्रीकृष्णदास जी जाजू प्रधानमंत्री थे। इस अधिवेशन में करीब 2000 हजार से ज्यादा समाज बंधु पधारे थे। इसमें 'यज्ञोपवीत संस्कार' यथा समय पर करने का अनुरोध तथा बालक-बालिकाओं को शिक्षा देने पर जोर दिया गया। ओसर सम्बन्धी नियम राज्यभर में सामाजिक रूप से जारी करने सम्बन्धी जोधपुर महाराज से प्रार्थना की गई। इस अधिवेद्गान में 50 हजार रू. का शिक्षा कोष स्थापित हुआ।

1913 में अलीगढ़ में श्री भागीरथदास जी भूतडा के प्रयत्नों से 'श्री जैसलमेरी माहेश्वरी महासभा' स्थापित हुई तथा इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता श्री गिरीधरलाल जी केला ने की। इसमें उपरोक्त मिलते जुलते छः प्रस्ताव स्वीकृत हुए।

1914 में 'श्री जैसलमेरी माहेश्वरी महासभा' का दूसरा अधिवेशन मथुरा में श्री गिरिधरलाल जी केला की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। जिसमें श्री जैसलमेरी माहेश्वरी महासभा का नाम बदलकर 'माहेश्वरी सभा' कर दिया गया। इस माहेश्वरी सभा के कुल 6 अधिवेशन हुए। तीसरा मेरठ में, चौथा देहली में श्री रा.ब.श्यामसुन्दर जी लोईवाल की अध्यक्षता में हुआ। जिसमें पहला प्रस्ताव नाम परिवर्तन के बारे में था। इस प्रस्ताव में माहेद्गवरी सभा का नाम श्री माहेश्वरी महासभा किया गया (जो शुरू जैसलमेरी माहेश्वरी महासभा था) जिसमें इतिहास लिखने सम्बन्धी, विवाह में दो गोत्र टालने सम्बन्धी, नव-युवकों को कला कौशल की शिक्षा देने, विदेश भेजने एवं उनकी सहायता करने सम्बन्धी प्रस्ताव पारित हुए। पांचवा अधिवेशन 1916 में कलकता में श्री रा.ब.श्यामसुन्दर जी लोईवाल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। जिसमें करीब 7 प्रस्ताव पारित हुए, जिसमें वैश्यानृत्य, अद्गलील गायन, आतिशबाजी, फिजूल खर्ची बंद करने सम्बन्धी तथा हिन्दी भाषा अपनाने सम्बन्धी प्रस्ताव तथा वेशभूषा सुधारने का अनुरोध किया गया।

1917 में पाली में श्री किरोडीमल जी मालू की अध्यक्षता में माहेश्वरी महासभा का तृतीय अधिवेद्गान हुआ। श्री शिववल्लभ जी मानधन्या प्रधानमंत्री थे। इस अधिवेशन में तेरह प्रस्ताव पारित हुए। जिसमें मुखयतः यथा समय यज्ञोपवीत संस्कार करने, शिक्षा प्रचारार्थ संस्थाएं खोलने के सम्बन्ध में तथा बाल, वृद्ध बेजोड विवाह, कन्या विक्रय, फिजूल खर्ची आदि का निषेध किया गया। महासभा की कार्यकारिणी समिति का चुनाव किया गया तथा कार्यकारिणी का नाम 'माहेश्वरी मंडल' रखा गया।

1920 में श्री माहेश्वरी महासभा (जैसलमेरी) का छठा अधिवेशन अलवर में हुआ। उसमें दोनों महासभाओं को सम्मिलित करने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। इस सम्मिलिकरण के लिए श्री रा.ब.श्यामसुन्दर लोईवाल तथा तपोधन श्री श्रीकृष्णदास जी जाजू ने प्रयास किए।

सन्‌ 1921 में माहेश्वरी महासभा का चौथा अधिवेशन आकोला में श्री.ब.श्री बल्लभदास जी मालपाणी (जबलपुर) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। जिसके स्वागत मंत्री ब्रजलाल जी बियाणी थे। अधिवेशन में करीब 2000 समाज बंधु पधारे थे। इस अधिवेशन में महासभा के उद्देश्य और नियम निर्धारित किये गये। छात्रवृति देने का उपक्रम इसी अधिवेशन से शुरू हुआ।

सन्‌ 1922 में कलकत्ता में दोनों सभाओं का संयुक्त अधिवेशन सम्पन्न हुआ। जिसका निमंत्रण आकोला के अधिवेशन में ही मिला था। श्री कृष्णदास जी जाजू ने अध्यक्ष पद का भार ग्रहण किया। श्री रामकृष्ण जी मोहता तथा श्री गोविन्ददास जी मालपाणी मंत्री थे। इस अधिवेशन में इस संस्था का नाम 'अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा' किया गया। इस अधिवेशन में श्री जाजू जी ने स्वदेशी तथा राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन किया। अधिवेशन में 23 प्रस्ताव स्वीकृत हुए जिसमे पूर्व अधिवेशनों के अनेके प्रस्ताव दोहराये गये थे।

सन्‌ 1923 में छठा अधिवेशन इंदौर में सम्पन्न हुआ। श्रीमान्‌ रामकृष्णजी मोहता ने अध्यक्ष पद ग्रहण किया। श्री गोविन्ददास जी मालपाणी एवं श्री बृजवल्लभदास जी मूंदड़ा मंत्री तथा उपमंत्री चुने गये। कलकत्ता अधिवेशन की तरह इन्दौर अधिवेशन में भी महासभा ने स्वदेशी अपनाने का अनुरोध किया। इस अधिवेशन में करीब २० प्रस्ताव पारित हुए। इन प्रस्तावों में प्रायः पूर्व प्रस्ताव दोहराये गये थे। महासभा द्वारा महासभा अधिवेशन कोष के लिए 20000/- रू. स्थायी रखने का निश्चय किया गया। महासभा समयोचित सुधार की पुकार उठाने वाली संस्था थी, इसलिए प्राचीन पंथी लोगों के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। यह संघर्ष 'कोलवार प्रकरण' के रूप में सन्मुख आया।

सन्‌ 1924 में बम्बई में सातवां अधिवेशन सेठ गोविन्ददास जी मालपाणी, जबलपुर की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री रामकृष्ण जी मोहता तथा श्री आईदान जी मोहता मंत्री तथा उपमंत्री थे। इस अधिवेशन में कोलवार प्रकरण के कारण संघर्ष हुआ। इस कारण वातावरण बहुत क्षुब्द था, फिर भी अनेक प्रस्ताव पारित हुए। श्री घनश्यामदास जी बिड़ला ने सुझाव दिया कि माहेश्वरी बालकों के लिये छात्रवृतियां रखी जाये।

इस दरम्यान भारत में पंचायतों के द्वारा महासभा से विरोध का वातावरण बनाने का प्रयत्न हुआ। कोलवार माहेश्वरियों के सम्बन्ध में पुनः जांच करने हेतु द्वितीय कोलवार कमीशन नियुक्त किया गया, जिसमें 15 सदस्य थे। इनकी रिपोर्ट के अनुसार कोलवार माहेश्वरी शुद्ध माहेश्वरी है तथा उनसे विवाह सम्बन्ध करने में बांधा नहीं है। यह प्रस्ताव कार्यकारी मण्डल में १६ अप्रेल 1924 को स्वीकृत किया गया।

सन्‌ 1927 में आठवां अधिवेशन पंढ रपुर में श्री रामगोपाल जी मोहता की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री रामकृष्ण जी मोहता एवं श्री ब्रजलाल जी बियाणी महामंत्री थे। कोलवार प्रकारण के कारण कलकत्ता पंचायत के प्रस्ताव में बहिष्कार नीति अपनाने सम्बन्धी अतिरेक हुआ था। इस अधिवेशन में सामाजिक बहिष्कार प्रथा के निषेध का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया, इस अधिवेशन में प्रथम बार माहेश्वरी महिला परिषद की स्थापना हुई।

सन्‌ 1929 में नौवा अधिवेशन धामनगांव में रावसाहेब श्री रूपचंदजी लाठी जलगांव की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री राजवल्लभ जी लढा तथा श्री नन्दकिशोर जी गोदानी महामंत्री व सहमंत्री थे। इस अधिवेशन में पहली बार बडी संखया में महिलाओं की उपस्थिति थी। इस अधिवेशन में पर्दा प्रथा के बहिष्कार की घोषणा की गई। श्री घनश्यामदास जी बिडला ने 51000/- रू. की राशी माहेश्वरी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने हेतु प्रदान की।

सन 1931 में दसवां अधिवेशन देवलगांव (राजा) में विदर्भ केसरी श्री ब्रजलालजी बियाणी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री नन्दकिशोर जी गोदानी एवं ब्रजबल्लभदास जी मूंदड़ा मंत्री बने। इसके बाद महासभा के सूत्र श्री बियाणी जी जैसे प्रतिभा सम्पन्न नेता के हाथ में रहें। इस अधिवेशन में पहली बार विधवा-विवाह के सम्बन्ध में प्रस्ताव प्रस्तुत किये गये। जिसमें कहां गया कि बाल विधवाओं की संखया ज्यादा हो रही है, यदि उनकी इच्छा हो तो उनके विवाह का समाज विरोध ना करे। इसी अधिवेशन में माहेश्वरी पत्र का भार उदीयमान युवक श्री रामगोपाल जी माहेश्वरी के हाथों में दिया गया एवं प्रकाशन कार्य नागपुर में आरम्भ किया गया।

सन्‌ 1934 में ग्यारहवां अधिवेशन अजमेर में श्री गोविन्ददास जी मालपाणी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री वृन्दावनदास जी बजाज मंत्री थे, कोलवार प्रकरण लेकर बम्बई अधिवेशन में उत्पन्न हुआ और पंढनपुर, धामनगांव तथा देवलगांव अधिवेशनों तक चला, संघर्ष इस समय शान्त हो चुका था। इस अधिवेशन में अनेक राजनीतिक एवं सामाजिक प्रस्ताव पारित हुए। महात्मा गांधी के हरिजन आन्दोलन के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई। स्त्रियों की घूंघट प्रथा उनकी उन्नति में बाधक एवं शारीरिक हृस का कारण बताते हुए शीघ्र हटाने का अनुरोध किया गया। इस अधिवेशन में महासभा की नियमावली में संशोधन किया गया। उसमें भविष्य में एक ही प्रधानमंत्री चुना जाये, ऐसा तय हुआ।

सन्‌ 1937में बारहवां अधिवेशन कानपुर में सम्पन्न हुआ। श्री बृजबल्लभदास जी मूंदडा (कलकत्ता) ने अध्यक्ष पद ग्रहण किया। श्री बालकृष्ण जी मोहता मंत्री रहे।

सन्‌ 1940 में सूरत में तेरहवां अधिवेशन सम्पन्न हुआ। जिसका निमंत्रण कानपुर में ही दिया गया था। इस अधिवेशन में अध्यक्ष का स्थान श्री रामकृष्ण जी धूत (हैदराबाद) ने सम्भाला था तथा श्री राधाकृष्ण जी लाहोटी (बम्बई) मंत्री थे। इस अधिवेशन में विधवा विवाह के समर्थन में प्रस्ताव पारित हुआ।

सन्‌ 1946 में महासभा का चौदहवां अधिवेशन स्वर्णजयंती के रूप में ग्वालियर में श्री गुलाबचन्द जी नागौरी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री राधाकृष्ण जी लाहोटी मंत्री थे। इस अधिवेशन में प्रथम बार समाज में बढ़ रही दहेज प्रथा का विरोध किया गया।

घ् ग्वालियर अधिवेद्गान के पद्गचात महासभा के कार्य में कुछ शिथिलता आयी। संगठन निष्क्रिय हुआ। ग्वालियर अधिवेशन में आगामी अधिवेशन के लिए जयपुर का निमंत्रण आया था, किन्तु परिस्थिति अनुकूल न होने से अधिवेशन नहीं हुआ।

सन्‌ 1960 में नागपुर में श्री रामगोपाल जी माहेश्वरी के निवास पर श्री ब्रजलाल जी बियाणी एवं रामगोपाल जी माहेश्वरी की प्रेरणा से बैठक होकर महासभा को पुनः सक्रिय बनाने हेतु 7 सदस्यों की कार्य संचालन समिति गठित की गई।

सन्‌ 1961 में महासभा का पंद्रहवां अधिवेशन दिल्ली में रा.ब.शिवरतन जी मोहता की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री रामकृष्ण जी धूत प्रधानमंत्री चुने गये। इस अधिवेशन में तपोधन श्री कृष्णदास जी जाजू की पुण्य स्मृति में 10 लाख का ट्रस्ट बनाने का निश्चय किया गया।

सन्‌ 1967 में महासभा का सोलहवां अधिवेशन बीकानेर में समाज के कर्मठ जनसेवी श्री रामगोपाल जी माहेश्वरी नागपुर की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में बम्बई के श्री रामजी तापडि या प्रधानमंत्री चुने गये। इसी अधिवेशन में बीकानेर में एक छात्रावास का निर्माण का निश्चय किया गया। जिसके लिए 60000/- रू. का आश्वासन प्राप्त हुआ तथा श्री कृष्णदास जाजू ट्रस्ट के लिए 40000/- रू. की राशी के आश्वासन प्राप्त हुए। इस अधिवेशन में एक लघु औद्योगिक प्रदर्द्गानी का भी आयोजन किया गया था। शारदा एक्ट के प्रणेता स्व. दीवान बहादुर हरिविलास जी शारदा की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया गया। श्री माहेश्वरी जी ने पंचायत संघर्ष काल में टूटे स्थानीय संस्थाओं से पुनः सम्बन्ध प्रस्थापित कर संगठन को दृढ एवं क्रियाशील बनाने पर जोर दिया। साथ-साथ आर्थिक एवं रचनात्मक कदम उठाने की भी उतनी ही आवद्गयकता प्रतिपादित की। उन्होंने कानपुर कार्यकारी मंडल की बैठक में 'कर्तव्य निर्देश' के रूप में आचार संहिता बनाने की प्रेरणा दी। यह आचार संहिता स्वीकृत हुई।

सन्‌ 1972 में सत्रहवां अधिवेशन कलकत्ता में सम्पन्न हुआ। बीकानेर अधिवेशन से समाज का कुशल नेतृत्व करने की वजह से श्री रामगोपाल जी माहेश्वरी पुनः अध्यक्ष निर्वाचित हुए। माहेश्वरी समाज के इतिहास में पहला अवसर था कि एक ही व्यक्ति लगातार दो अधिवेशनों के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। श्री बद्रीप्रसाद जी तोषनीवाल प्रधानमंत्री चुने गए। इस अधिवेशन में अ.भा.युवा संगठन का प्रादुर्भाव हुआ। कानपुर कार्यकारी मंडल बैठके में पारित आचार संहिता पर जोर देना निश्चित हुआ। आचार संहिता के चार सूत्र मान्य हुए।
विवाह सम्बन्ध में मांग या ठहराव न हो तथा सगाई का तिलक 101/- रू. से ही किया जाये।
विवाहादि प्रसंगों पर दिखावा न हो तथा सभी कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो।
जाजू ट्रस्ट का लक्ष्य 25 लाख रू. किया गया तथा लक्ष्यपूर्ति हेतु देशव्यापी दौरों का आयोजन करने का निश्चय हुआ।

सन्‌ 1976 में नागपुर में अठारहवां अधिवेशन पूना के श्री लक्ष्मीरायण राठी की अध्यक्षता में भव्य रूप में सम्पन्न हुआ। श्री रामनिवास जी लखोटिया कलकत्ता महामंत्री चुने गये। श्री राठी जी ने आगमी सत्र के लिए क्रेश प्रोग्राम दिया तथा आचार संहिता पर पुनः विशेष बल दिया गया। अधिवेशन अति भव्य था तथा उपस्थिति लगभग 10000 व्यक्तियों की थी।

सन्‌ 1982 में उन्नीसवां अधिवेशन अलीगढ़ में श्री हरिकिशन जी मुछाल इन्दौर की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। श्री रघुनाथदास जी सोमानी कलकत्ता महामंत्री चुने गये।

सन्‌ 1985 में बीसवां अधिवेशन इन्दौर में हुआ। श्री रघुनाथदास जी सोमानी अध्यक्ष तथा श्री हरिनारायण जी सादानी महामंत्री चुने गये।

सन् ‌1986 में तपोधन श्री कृष्णदास जी जाजू का शब्तादी वर्द्गा था। इस अवसर पर कार्यकारी मण्डल के सभी सदस्यों को जाजू जी का चित्र व स्टीकर भेजे गये एवं उनकी स्मृति में उनकी जीवनी प्रकाक्षित की गई, जिसका नाम ''राजनीति का विकल्प'' था। इसी सत्र में अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के इतिहास लेखन का कार्य प्रारम्भ हुआ। प्रथम खण्ड 'अमृत बल्लरी' नाम से1985 के अन्त में प्रकाशित हुआ। दूसरा अंक 1989 में। इस ग्रन्थ में महासभा की यात्रा सन्‌1862 से लेकर 1930 तक लिखी गयी। आगे का कार्य पाण्डुलिपि के रूप में कुछ तैयार किया हुआ है। इस सत्र में जाजू ट्रस्ट के धन संग्रह हेतु एवं सामाजिक विचार क्रांन्ति को जन-जन तक पहुंचाने के लिये व्यापक भ्रमण हुए। कार्यकर्ता सम्मेलन हुए जिसके फलस्वरूप नये-नये कार्यकर्ता महासभा से जुडे। ''मैरीज ब्यूरो'' व ''सामूहिक विवाह'' का भी काफी प्रचार-प्रसार हुआ। पूर्वोत्तर में महासभा की स्थापना के बाद पहली बार गौहाटी में कार्यकारी मंडल का अधिवेशन हुआ, जिसमें आसान व आस-पास के क्षेत्रों में बहुत बड़ी जागृति हुई।

सन्‌ 1989 में तिरूपति में कार्यकारी मंडल का इक्कीसवां अधिवेशन सम्पन्न हुआ। जिसमें मद्रास के समाज सेवी श्री बालकृष्ण जी कोठारी ने सभापति का पद ग्रहण किया तथा वाराणसी के श्री गोवर्धनलाल जी झंवर महामंत्री चुने गये। इस अधिवेशन में जाजू ट्रस्ट की एक करोड की लक्ष्यपूर्ति की घोषणा की गई।

सन्‌ 1994 में महासभा का 22 वां अधिवेद्गान जैसलमेर में आयोजित किया गया। जिसमें हैदराबाद के श्री ब्रदीनारायण जी राठी ने सभापति का पद ग्रहण किया। संगमनेर के श्री ओंकारनाथ जी मालपाणी का महामंत्री पद के लिये निर्विरोध निर्वाचन हुआ। इस सत्र में प्रादेशिक संगठन को श्रंखलाबद्ध करना प्रादेशिक ट्रस्ट, सम्मेलनों का आयोजन करना आदि पर विशेष ध्यान दिया गया।

सन्‌ 1995 को जनगणना वर्ष घोषित किया गया और सभी प्रान्तों की जनगणना की गई।

सन्‌ 1998 में इचरकरंजी में महासभा का २३ वां अधिवेशन सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में श्री बद्रीलाल जी राठी ने पद ग्रहण किया। श्री ओंकारनाथ जी मालपाणी का महामंत्री पद पर पुनः निर्वाचन हुआ। इस सत्र में हर जिले में जिला सभा स्थापित करना का प्रयास करना, प्रत्येक प्रान्त में प्रादेशिक ट्रस्ट का गठन करना, प्रान्तवार विवाह सहयोग केन्द्र तथा परिचय सम्मेलन कराने पर जोर देना, व्यापार उद्योग सहयोग केन्द्र द्वारा युवाओं को व्यापार करने में आर्थिक सहयोग करना, प्रोफेशनल सेल तथा प्रशिक्षित शिविरों का आयोजन आदि बातों का मुखयतः करने का निश्चय हुआ। इस सत्र में आदित्य विक्रम बिड़ला व्यापार सहयोग केन्द्र, जिसके द्वारा जरूरतमंदों को व्यवसाय हेतु 50 हजार रूपये तक का कर्ज देने का लक्ष्य रखा गया था, विशेष उपलब्धि का कार्य था। श्री रामगोपाल माहेश्वरी स्मृति शिक्षा कोष की भी स्थापना की, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति प्रदान करना था। गांधीधाम में महासभा के नाम से छात्र, छात्राओं हेतु दो हॉस्टल का निर्माण इस सत्र की विशेष उपलब्धि थी।
अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के 24 वें सत्र (24 जुलाई 2002 से जनवरी 2006) हेतु तत्कालीन संविधान की व्यवस्थानुसार सभापति का चुनाव पुण्यनगरी उज्जैन (मध्यप्रदेश) में 23 सितम्बर 2001को हुआ जिसमें श्री चुन्नीलाल सोमानी, कलकत्ता सभापति पद पर निर्वाचित हुए तथा शेष पदाधिकारियों का निर्वाचन 14 जुलाई 2002 को शौर्यनगरी उदयपुर (राजस्थान) में हुआ, जिसमें महामंत्री पद पर श्री श्यामसुन्दर जी सोनी, नागपुर निर्वाचित हुए। उदयपुर में ही नवीन सत्र की कार्यसमिति एवं कार्यकारी मण्डल की प्रथम बैठक सम्पन्न हुई। इस सत्र में कार्यसमिति की 11 एवं कार्यकारी मण्डल की 4 बैठक हुई।

24 वें सत्र की विशेष उल्लेखनीय उपलब्धियों में महासभा की अपनी वेबसाईट, अपना स्थाई केन्द्रीय कार्यालय आपदा कोष, माहेश्वरी युनिवर्सिटी तथा जनगणना को रखा जा सकता है।

इस सत्र में महासभा की वेबसाइट बनाना, नागपुर में केन्द्रीय कार्यालय भवन खरीदना विशेष उपलब्धि रही। वर्तमान में माहेश्वरी पाक्षिक का कार्यालय भी यही है। मुखय सभा कक्ष का नाम श्री चुन्नीलाल जी सोमाणी कक्ष रखा गया। इस सत्र मे माहेश्वरी विश्व विद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव पास हुआ, किन्तु राजकीय नियमों की रूकावट के कारण कार्य आगे नहीं बढ सका। माहेश्वरी बोर्ड के अध्यक्ष श्री नथमल जी डालिया ने माहेश्वरी पत्रिका को नया स्वरूप देने का प्रयास किया।

महासभा का 25 वां (रजत जयन्ती) सत्र दिनांक 6 जनवरी, 2006 को औरंगाबाद (महाराष्ट्र) मे सम्पन्न चुनावों के साथ प्रारम्भ हुआ। इस सत्र के लिए श्री रामपाल जी सोनी भीलवाड़ा को सभापति पद एवं श्रीकस्तुरचन्द जी बाहेती चैन्नई को महामन्त्री पद का दायित्व सौंपा गया। इस सत्र की विशेष उपलब्धियॉं इस प्रकार रही।

1. श्रीकृष्णदास जाजू स्मारक ट्रस्ट द्वारा विधवा एवं जरूरतमंद बहिनों को दी जा रही सहायता को .......................... से ........................... दो बार में बढ़ा कर 700 रूपये मासिक की गई। कक्षा 6 से 12 तक के जरूरतमंद मेधावी बालकों को 2000 रूपये से 3000 रूपये तक छात्रवृत्ति देने का निर्णय लिया। जाजू ट्रस्ट के कॉरपस फण्ड मे 19 ,81,800/- रूपये की वृद्धि हुई।
2. श्रीआदित्य विक्रम बिडला व्यापार सहयोग केन्द्र - इस ट्रस्ट द्वारा पूर्व मे 50 हजार रूपये तक का ऋण प्रदान किया जाता था जिसे इस सत्र में बढा कर 2 लाख रूपये किया गया। इस सत्र में 5 7 नये उद्यमियों को 427-25 लाख रूपये का ऋण स्वीकार किया गया। इस ट्रस्ट द्वारा प्रदेशाध्यक्ष की शिफारिस पर 20 हजार रूपये तक का ऋण बिना गारन्टी दिये जाने का प्रस्ताव भी इस सत्र मे स्वीकार किया गया।
3. श्री रामगोपाल माहेश्वरी स्मृति शिक्षा केन्द्र मे 83-2 लाख रूपये का कॉरपस फण्ड है। इस सत्र मे 102 विद्यार्थियों को 25-65 लाख रूपये की ऋण सहायता स्वीकृत की गई ।
4. श्री कोठारी बन्ध शौर्य स्मृति ट्रस्ट द्वारा इस सत्र मे (1) माहेश्वरी समाज का स्वतन्त्रता संग्राम मे योगदान एवं (2) माहेश्वरी समाज के शीश पुष्प नामक दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ तथा 5 विभूतियों का शौर्य एवं वीरता हेतु सम्मान किया गया जिनमे एक पुरूष एवं 4 महिलाएं है।
5. छात्रावास निर्माण योजना के अन्तर्गत (1) पूना (2) भिलाई (छात्र एवं छात्राओं हेतु पृथक-पृथक) (3) कोटा मे छात्रावास भवनों का निर्माण हो विद्यार्थियों को आवासीय सुविधाएं दी जा रही है (4) मुम्बई मे समाज बन्धुओं द्वारा निर्मित 9 भवनों मे छात्रावास संचालित किया जा रहा है। सभी स्थानों पर प्रमुख दानदाताओं द्वारा दिये गए नाम से इन छात्रावासों का नामकरण किया गया है ।
6. श्री बद्रीलाल सोनी माहेश्वरी शिक्षा सहयोग केन्द्र - इस ट्रस्ट द्वारा उच्च तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा हेतु बैंकों से लिये गए 4 लाख रूपये तक के ऋण पर ब्याज राशी का 50 प्रतिशत हिस्सा सहायता स्वरूप प्रदान किया जाता है तथा 25 प्रतिशत ब्याज राशी की पूर्ति जिला या प्रदेश सभा द्वारा की जाती है। इस ट्रस्ट की स्थापना 25 वें सत्र मे सन्‌ 2007 मे 5 करोड़ रूपये के कॉरपस फण्ड से की गई। इस सत्र में कुल 201 विद्यार्थियों को 16,62,644/- रूपये ब्याज सहायता के रूप मे प्रदान किये गए है तथा बैंको द्वारा विद्यार्थियों को 5-82 करोड रूपये का ऋण दिया गया है।
7. महासभा ने दिनांक 28, 29 एवं 30 दिसम्बर, 2007 को भीलवाडा मे अन्तर्राष्ट्रीय माहेश्वरी महाअधिवेशन का आयोजन किया जिसमे लगभग 25 हजार समाज बन्धुओं ने देश के कौने-कौने से पधार कर उपस्थिति दी। इस अवसर पर लगभग ३५० अनिवासी भारतियों ने भी उपस्थित होकर समाज को लाभान्वित किया। इस अधिवेशन मे (1) राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के खयातनामा विद्वानों की सामाजिक, आर्थिक एवं भावी भारत की तस्वीकर से सम्बन्धित सारगर्भित वार्ताओं का आयोजन किया गया तथा (2) ''भीलवाडा घोषणा पत्र'' के नाम से 13 प्रस्ताव विजन 2020 पास किया गया।
8. पच्चीसवें सत्र में श्रृंखलाबद्ध संगठन को व्यापक एवं सुदृढीकरण के प्रयासों के अन्तर्गत जिला एवं प्रदेश स्तर के मॉडल विधान स्वीकार कर पूरे देश मे इसे लागू कर 26 वें सत्र के निर्वाचन इन्ही विधानों के आधार पर सम्पन्न हुए।
9. इस सत्र में जिला सभाएं प्रदेश सभाओं को कम्प्युटर हेतु अनुदान प्रदान किया जिसके अन्तर्गत जिला सभाओं को राशी प्रदान की गई। कैरियर गाइडेन्स द्गिाविर एवं कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविरों हेतु भी राशि का अनुदान दिया गया।
10. साहित्य प्रकाशन योजना के अन्तर्गत निम्न तीन पुस्तिकाएं प्रकाशित कर उन्हे पूरे देश मे निःशुल्क वितरित की -
अ- माहेश्वरी समाज - राष्ट्र सेवायें
ब- सामाजिक समस्यों - एक विंहगम दृष्टि
स- महासभा योजनाएं एवं कार्यक्रम
11. महासभा द्वारा गठित परिवार परिवेदना प्रकोष्ठ ने पूरे देश के अलग अलग स्थानों पर 50 से अधिक प्रकोष्ठों की स्थापना की। सभी केन्द्र पूर्ण जिम्मेदारी से उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहे है।
12. इसके अलावा निम्न प्रकोष्ठों ने भी अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा एवं जिम्मेदारी से पूरा किया -
अ- लेखक-वक्ता प्रकोष्ठ
ब- विवाद निवारण एवं समन्वय प्रकोष्ट
स- विधान एकरूपता प्रकोष्ठ
द- परिचय पुस्तिका प्रकाद्गान प्रकोष्ट
य- राजनैतिक प्रकोष्ट
13. महिला एवं युवा संगठन ने भी अपनी योजनाओं के अनुसार पूर्ण सत्र तक उल्लेखनीय कार्य किये है, जिससे समाज की महिलाओं एवं युवाओं मे नये विचारों का सूत्रपात हो संगठन से जुड़ने की प्रवृत्ति बढी है ।
14. पूरे सत्र में सभापति कार्यालय से 36000 एवं महामन्त्री कार्यालय से 15000 से अधिक पत्र भेजे गए तथा टेलिफोन के माध्यम से हजारों लोगों से सम्पर्क किया गया ।

 



Copyright © All Rights Reserved www.maheshwariworld.org            Designed & Developed by Space Infotech